हम करें राष्ट्र आराधन | The Gopal

हम करें राष्ट्र आराधन | The Gopal

'हम करें राष्ट्र आराधन':

महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण में लंका विजय के पश्चात मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा था- "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" (माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं)। भारतवर्ष की इसी सनातन परंपरा और वैदिक राष्ट्रवाद का आधुनिक शंखनाद है गीत- 'हम करें राष्ट्र आराधन'। यह गीत केवल कुछ पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि यह आचार्य चाणक्य की 'राष्ट्रनीति', भगवान श्रीकृष्ण के 'निष्काम कर्मयोग' और हमारे ऋषियों के उस तपोबल का सार है, जिसने इस भूमि को 'विश्वगुरु' बनाया था। आइए, इस कालजयी रचना का अपनी गौरवशाली विरासत के चश्मे से दर्शन करें।

"हम करें राष्ट्र आराधन,
तन से, मन से, धन से,
तन-मन-धन जीवन से,
हम करें राष्ट्र आराधन।"

आचार्य चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में स्पष्ट किया है कि एक नागरिक का सर्वोच्च धर्म उसका 'राष्ट्र' है। जब विदेशी आक्रांता सिकंदर भारत की देहरी पर था, तब चाणक्य ने तक्षशिला के विद्यार्थियों से इसी 'तन-मन-धन' के समर्पण का आह्वान किया था। यह मुखड़ा हमें बताता है कि राष्ट्र की सेवा एक महायज्ञ है, जिसमें हमें अपने स्वार्थ, अपनी संपत्ति और अपने शरीर की आहुति देनी होती है। महर्षि दधीचि ने जिस प्रकार वृत्रासुर के वध और धर्म की रक्षा के लिए अपनी अस्थियों का दान कर दिया था, वही समर्पण आज यह गीत हमसे मांग रहा है।

"अन्तर से, मुख से, कृति से,
निश्चल हो निर्मल मति से,
श्रद्धा से मस्तक नत से,
हम करें राष्ट्र अभिवादन।"

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने 'मनसा, वाचा, कर्मणा' (मन, वचन और कर्म) की एकरूपता को सच्चे योगी का लक्षण बताया है। 'अन्तर से, मुख से, कृति से' का अर्थ वही है जो गीता का निष्काम कर्म है—बिना किसी कपट के, शुद्ध सात्विक बुद्धि (निर्मल मति) से देश का कार्य करना। जिस प्रकार कुरुक्षेत्र के युद्ध में अर्जुन ने अपने सभी संशयों का त्याग कर, पूर्ण श्रद्धा और नत-मस्तक होकर ईश्वर रूपी राष्ट्र-धर्म को स्वीकारा था, हमें भी उसी निर्मल भाव से अपनी मातृभूमि के समक्ष नतमस्तक होना चाहिए।

"अपने हँसते शैशव से,
अपने खिलते यौवन से,
प्रौढ़ता पूर्ण जीवन से,
हम करें राष्ट्र का अर्चन।"

यह पद हिंदू दर्शन की महान 'आश्रम व्यवस्था' का स्मरण कराता है। ब्रह्मचर्य (शैशव/बचपन का विद्याध्ययन), गृहस्थ (यौवन की ऊर्जा), और वानप्रस्थ/संन्यास (प्रौढ़ता का अनुभव)—जीवन का हर कालखंड केवल ईश्वर और राष्ट्र को समर्पित होना चाहिए। जैसे वीर अभिमन्यु ने अपने 'हँसते शैशव' और 'खिलते यौवन' में ही धर्म की रक्षा के लिए चक्रव्यूह भेदा था, और जैसे भीष्म पितामह ने अपनी 'प्रौढ़ता' में आजीवन हस्तिनापुर के सिंहासन (राष्ट्र) की रक्षा का व्रत निभाया, उसी प्रकार हमें अपने जीवन के हर चरण में राष्ट्र का अर्चन करना है।

"अपने अतीत को पढ़कर,
अपना इतिहास उलटकर,
अपना भवितव्य समझकर,
हम करें राष्ट्र का चिंतन।"

महाभारत का एक बहुत बड़ा भाग केवल अतीत की कथाओं और 'विदुर नीति' जैसे उपदेशों से भरा है, क्योंकि जो समाज अपना इतिहास भूल जाता है, उसका भविष्य नष्ट हो जाता है। चाणक्य ने नंद वंश के पतन और सिकंदर के आक्रमण के 'अतीत को पढ़कर' ही भविष्य के अखंड भारत की रूपरेखा तैयार की थी। यह गीत हमें चेतावनी देता है कि हम अपने सनातन इतिहास का अध्ययन करें, अपनी भूलों को समझें और आने वाली पीढ़ियों के 'भवितव्य' (भविष्य) को सुरक्षित करने के लिए गहन चिंतन करें।

"है याद हमें युग-युग की, जलती अनेक घटनायें,
जो माँ के सेवा पथ पर, आई बनकर विपदायें।
हमने अभिषेक किया था, जननी का अरिशोणित से,
हमने शृंगार किया था, माता का अरिमुंडों से।"

यह पंक्तियां क्षात्र धर्म का उद्घोष हैं। त्रेता युग में रावण का आतंक हो, या द्वापर में कौरवों का अधर्म, अथवा कलियुग में सोमनाथ को लूटने वाले विदेशी आक्रांता; भारत माता ने अनेकों विपदाएं झेली हैं। परंतु हमारे पूर्वजों ने कायरता नहीं दिखाई। जिस प्रकार माता नवदुर्गा ने महिषासुर और रक्तबीज का वध कर उनके मुंडों की माला धारण की थी, उसी प्रकार हमारे शूरवीरों (जैसे महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज) ने मातृभूमि की रक्षा के लिए शत्रुओं के रक्त (अरिशोणित) से इस धरती का अभिषेक किया और अत्याचारियों के शीश (अरिमुंडों) से इसका शृंगार किया। यह धर्मयुद्धों की गौरवगाथा है।

"हमने ही उसे दिया था, सांस्कृतिक उच्च सिंहासन,
माँ जिस पर बैठी सुख से, करती थी जग का शासन।
अब काल चक्र की गति से, वह टूट गया सिंहासन,
अपना तन मन धन देकर, हम करें पुनः संस्थापन।"

वह त्रेता युग का 'रामराज्य' ही था, जब भारत सांस्कृतिक रूप से विश्व के सर्वोच्च सिंहासन पर विराजमान था। वेद, उपनिषद और हमारी सनातन संस्कृति से पूरा विश्व प्रकाशित होता था। परंतु महाभारत में भगवान कृष्ण कहते हैं- "मैं काल हूँ"। इसी कालचक्र (समय के पहिये) के घूमने से, हमारी आपसी फूट और विदेशी दासता के कारण वह सांस्कृतिक सिंहासन टूट गया। आज चाणक्य की शिखा फिर से खुली है, यह आह्वान करते हुए कि हम सब अपना सर्वस्व (तन, मन, धन) अर्पण कर दें, ताकि भारतवर्ष को पुनः 'विश्वगुरु' के उसी सर्वोच्च और दिव्य सिंहासन पर स्थापित (पुनः संस्थापन) किया जा सके। यही कलियुग का सबसे बड़ा धर्म है।

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